अमृत मंथन में जब निकला
गरल ताप तब बढ़ा,
भुवन सब झुलसे।
याद तभी आये थे शंकर,
पिया उन्हीं ने जहर,
मगन सब सरसे।
विष को धारण करके गले,
कहाये नीलकंठ थे प्रभू,
विराजे चन्द्र ऊर्ध्व सिर पर।
अमिय रस झरे चन्द्र से,
साथ शीतलता भी बरसे,
दाह को शीघ्र शान्त कर।
आज भी सीधे भोले लोग,
गरल ही पीते रहते सदा,
उन्हीं के भाग्य लिखा है लेख।
विचारें! शिव के ही वे अंश,
बांटते रहते हैं अमृत,
जरा नयनों को खोले देख।
सत्य शिव सुन्दर है जो तत्व,
अमरता का द्योतक है सत्व,
फ़कीरों का ही है यह काम।
हमारा शंकर भी औघड़,
कहाता सबसे है सुंदर,
सुखाता तप से है जो चाम।
© सुशील चन्द्र बाजपेयी
लखनऊ (उ.प्र.)
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