Friday, July 11, 2025

आशुतोष शंकरा : नीलम सगोरिया जी

आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा
शिव समाए सृष्टि में सूक्ष्म रूप
कंकरा
तुमआकाश , तुम पाताल
हो विशाल शंकरा
आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा

बारह ज्योतिर्लिंग विराजे
माथे चन्द्रमा उज्जवल साजे
जटाशीश गंग , सर्प माल गले अंकरा
आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा

नंदी की सवारी त्रिशूल कर धारे  
त्रिपुंड धारी, रुदाक्ष माला पहने
भस्म रमाए, धारे बाघ अंबरा
आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा

जय हो जय हो शंकरा
नमामि देव शंकरा
कैलाश वासी शंकरा
रुद्र देव शंकरा

मौलिक स्वरचित
© नीलम सगोरिया

शिव आराधना : सुनील कुमार जी

नमन मंच 
मैं भी कलमकार दैनिक क्रिया कलाप 
दिनांक 11/07/2025
दिन: शुक्रवार 
क्रिया कलाप: शिव काव्य अभिषेकं
शैली: पद्य 
शीर्षक: शिव आराधना 
************************************
शिव शंकर डमरू वाले हम भक्त तुम्हारे 
लो हम तो आ गए अब शरण में तुम्हारे
शिव शंकर हम भक्त तुम्हारे।

मुफलिस गरीब हम हैं औकात क्या हमारी
आन पड़ी है हम पर आज विपदा भारी 
मझधार में फंसे हैं मिलते नहीं किनारे 
शिव शंकर हम भक्त तुम्हारे।

तेरी दया से चलती है दुनिया सारी
इक तुम ही हो दाता सारा जग है भिखारी
हम पर दया जो कर दो 
बन जाए बिगड़ी हमारी।

शिव शंकर हम भक्त तुम्हारे बेआस-बेसहारे
लो हम तो आ गए अब शरण में तुम्हारे
शिव शंकर हम भक्त तुम्हारे।

दर से न तेरे लौटा कोई ले‌कर झोली खाली
हम पर दया जो कर दो बन जाए बिगड़ी हमारी 
विनती मेरी भी सुन लो बस इतनी अरज हमारी
दर पर तेरे खड़ा हूं लेकर झोली खाली
झोली मेरी भी भर दो हे त्रिनेत्र धारी।

स्वरचित मौलिक रचना
रचनाकार-सुनील कुमार 
जिला- बहराइच ,उत्तर प्रदेश।
मोबाइल नंबर 6388172360

शिव शक्ति : सुनीता देवी मौर्य जी

'शिव शक्ति '

  हे त्रिलोचन! त्रिताप हरो,
  हर संकट दूर करो प्रभु ।
  बस तेरा एक सहारा है,
 हे श्री कण्ठ महादेव प्रभु।।१।। 

हे नीलकंठ !शिव- शंकर- शंभू, 
 लीला तेरी न्यारी ।
विष- अमृत में भेद नहीं ,
सारी सृष्टि प्यारी।।२।।

 जग कहता तुझको महादेव,
   तू गंगाधर हो त्रिपुरारी। 
कैलाशपति- गिरजापति,
 जग लीला तेरी न्यारी।।३।।

  बामदेव -कपर्दी- महेश्वरि!
    लीला तेरी अपरंपार ।
सुर- नर - मुनि पार न पाते,
   महिमा तेरी अपरंपार।।४।।

 हंसकर हरते कष्ट भक्त के,
    शीघ्र प्रसन्न हो जाते ।
आशुतोष है नाम तुम्हारा,
   सब की पीडा़ हरते।।५।।

सुनीता देवी मौर्य,
 अंबेडकर नगर ,
   उत्तर प्रदेश

शिव ही शास्वत सत्य है : मीना जोशी 'मनु' जी

*शिव ही शास्वत सत्य है*

भोले शंकर देवादिदेव,नीलकंठ महादेव,
तुम्हारी भक्ति में हर श्वास समर्पित है।
मंथन का विष पीकर भी तुमने,
जगत को जीवन दान दिया।

बेलपत्र, धतूरा, जल के कण—
सब तेरे चरणों में अर्पित हैं।
सावन की बूँदों में घुला आशीष,
तेरी कृपा का मधुर प्रसाद।

पवित्र ॐ नाम का नाद सृष्टि में,
मन का सब अंधकार मिट जाता है।
हे शिव, बस इतना वरदान दो—
नादान के सिर पर हाथ नाथ का हो ।

© मीना जोशी 'मनु'
हल्द्वानी, उत्तराखण्ड

शिव काव्य अभिषेकं : राम प्रकाश गहोई जी

"शिव काव्य अभिषेकं"
शिव की भक्ति में ।
                   शक्ति मिलती है।
जीवन चलता शांति से।
                  खुशी मिलती है।।
सावन के महीने में ।
                 अवतरित होते हैं विश्वनाथ।
करते है सवारी ।
                 मृत्यु लोक की भोलेनाथ ।।
इसीलिए अभिषेक।
                 करते हैं भक्त ।
खुशी देते हैं वो।
                 अच्छा रहता है वक्त।।               
शिव कितने भोले।
                   खुश होते शीघ्र।
देते हैं वरदान ।
                   पूजा से तीव्र ।।
शिव सा नहीं है।
                    कोई भी दूजा।
मैं उनकी करूं ।
                    रोज ही पूजा।।
आज कर रहा हूं।
                  शब्दों में अभिषेक।
भगवान शिव दें ।
                   ज्ञान और विवेक।।
मैं करता हूं वंदन।
                   मन और कर्म से।
राम है समर्पित।
                   लेखनी हो धर्म से।।

राम प्रकाश गहोई

श्रीकंठ/ नीलकंठ : डॉक्टर लूनेश कुमार वर्मा जी

श्रीकंठ/ नीलकंठ 

देव और दानव मिल किए थे चिंतन। 
रत्नाकर से किया जाए रत्न वरण।

किए समुद्र मंथन मिल योजना बना।
नाग रज्जू मथनी सुमेरू पर्वत बना।

रत्नाशा थी प्रबल उत्साहित थे सब।
लालसा थी करना है पान अमृत रस।

भूल गए अमृत से पहले मिलेगा विष।
उठ खड़ी समस्या विकराल कैसे हित।

न सूझता किसी को कुछ शीघ्र उपाय।
कालों के महाकाल आए बरबस याद।

गए मिल करो कुछ तुम समाधान देव।
भोले तो हैं भोले लाओ वह तुम पेय।

कर लिया ग्रहण हसकर हित कारण।
उदर से पहले श्री कंठ में किया वरण।

हुए प्रसिद्ध जगत में तब से नीलकंठ।
भोले तो भोले हैं जल से ही होते संत।

डॉ. लूनेश कुमार वर्मा 
रायपुर छत्तीसगढ़

श्रीकण्ठ महादेव : रमापति मौर्य जी

'श्रीकण्ठ महादेव '

 श्रीकण्ठ महादेव तुम्हारी,
  जग में महिमा न्यारी।
 सुन्दर लम्बी जटा तुम्हारी, लगती प्यारी- प्यारी।।१।।

चिर समाधि में लीन भोले,
 भोली -भाली मुस्कान। कण-कण में बसते हे भोले ,
  गजब तेरी मुस्कान ।।२।।
   
 शीष चन्द्रमा जटा में गंगा,
    गले में विषधर नाग।
बिच्छू -बाघाम्बर से शोभित ,
 शोभित होते विष नाग।।३।।

   कैलाशपति हे शिव शंकर!
   हे आशुतोष !भोले दानी।
  भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते,
   करुणानिधि भोले दानी।।४।।
    
   मेरा भी कष्ट हरो भोले, 
   संकटमोचक- विषपाई ।
   हंसकर हरते कष्ट भक्त के,
    भक्तों के सुखदाई ।।५।।

   देते अमृत दुनियां को,  
   खुद हलाहल पी जाते।
  तभी तो बाबा नीलकंठ ,
    भोले कहलाते।।६।।

तेरी तुलना नहीं है जग में,
    कोई करने वाला। 
तू तो है जग भोला दानी,
   संकट हरने वाला।।७।।

   कालों के हो महाकाल,
जग तुझको कालेश्वर कहता।
  सृष्टि के हो संहारक ,
उत्थान -पतन जग कहता।।८।।

विरक्त भाव -समाधि लीन,
तन भस्म सुसज्जित होता। 
तीन लोक में काशी न्यारी,
शिव जय -जय कारा होता।।९।।

महिमा गजब निराली भोले,
    भांग -धतूरा खाते।
गले में नाग कान में बिच्छू,
 भोले शोभित होते।।१०।।
 
धन्य- धन्य हो भोले बाबा,
    धन्य तुम्हारी कृपा।
सारा जग है तेरी शरण में, 
    रहती तेरी कृपा।।११।।

  © रमापति मौर्य,
 अंबेडकर नगर ,
   उत्तर प्रदेश

कैलाश के तुम वासी हो : ललित महालकरी जी

श्री कंठ की शोभा न्यारी, 
असुरों के शत्रु त्रिपुरारी" ।

"गरल कंठ में थाम लिया, 
श्री राम को उर में धार लिया" ।

"कैलाश के तुम वासी हो, 
बैरागी और अविनाशी हो" ।

"शिव को जो सावन में ध्याते हैं, 
आशुतोष की पूर्ण कृपा वे पाते हैं" ।

प्रेषक 
© ललित महालकरी 
इंदौर

हे विषपायी तुम्हें प्रणाम : सुशील चन्द्र बाजपेयी जी

हे विषपायी तुम्हें प्रणाम
अमृत मंथन में जब निकला 
गरल ताप तब बढ़ा,
भुवन सब झुलसे।
याद तभी आये थे शंकर,
पिया उन्हीं ने जहर,
मगन सब सरसे।

विष को धारण करके गले,
कहाये नीलकंठ थे प्रभू,
विराजे चन्द्र ऊर्ध्व सिर पर।
अमिय रस झरे चन्द्र से,
साथ शीतलता भी बरसे,
दाह को शीघ्र शान्त कर।

आज भी सीधे भोले लोग,
गरल ही पीते रहते सदा,
उन्हीं के भाग्य लिखा है लेख।
विचारें! शिव के ही वे अंश,
बांटते रहते हैं अमृत,
जरा नयनों को खोले देख।
  
सत्य शिव सुन्दर है जो तत्व,
अमरता का द्योतक है सत्व,
फ़कीरों का ही है यह काम।
हमारा शंकर भी औघड़,
कहाता सबसे है सुंदर,
सुखाता तप से है जो चाम।

© सुशील चन्द्र बाजपेयी
लखनऊ (उ.प्र.)

बोलो प्रेम से हर हर महादेव : मोनिका डागा आनंद जी

विषय - प्रथम नाम श्रीकंठ सुंदर गर्दन/ कंठ वाले (शिव काव्याभिषेक)
दिनांक - 11-7-2025
शीर्षक - बोलो प्रेम से हर हर महादेव

आया आया है देखो सावन छम छम, 
बाजे भोले बाबा का डमरू डम डम, 
भक्त शिव पूजन को चले हो मतवाले,
जोर शोर से बोले जयकारा बम बम ।

मेघों ने जल बरसाया धिनक धिन धिन,
बूंदों ने संग गीत गाया तिनक तिन तिन,
हमारे तो श्रीकंठ महादेव ही हैं रखवाले, 
झूमें भक्ति में भक्त धिनक धिन धिन ।

मन भावन पवन बहे सुहानी सर सर,
झिंगूर, मेढ़क, पपीहरा बोले टर टर,
विनती सुनो भोले नाथ ओ डमरू वाले,
 शिव अनंत शंभु कृपा अनंता हर हर ।

ढोलक, मंजीरे, मृदंग करे हैं झम झम,
घुॅंघरू बाजे शिवगण भी नाचें छम छम,
भव सिंधु से पार लगाएँगे बाघम्बर वाले, 
जपे जा नमः शिवाय मंत्र दमा दम दम ।

बोलो प्रेम से हर हर महादेव बम बम,
सच्ची श्रद्धा से दुख होगें सारे कम कम,
"आनंद" औघड़नाथ है जटा जूट वाले,
भूल जा शिव भक्ति में सारे गम गम ।

© मोनिका डागा "आनंद", चेन्नई, तमिलनाडु 🙏❤️🙏  
आपके स्नेह और प्यार का धन्यवाद !💕
रचना ( स्वरचित व सर्वाधिकार सुरक्षित)✍️

हे नवामी शंकर : अजय सरजोशी

हे नवामी शंकर
====================
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर......
मेरे ताप हरो मेरे कष्ट हरो हे
हरि हरेश्वर..........
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर......
मंथन का विष प्राशन
कर तुम नीलकंठ कहलाये
तुम्हारा त्याग औऱ बलिदान देख
भक्त तुम्हे बंब बंब भोले बुलाए.................
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर......
तुम्हारी कृपा से हम भक्तों का
भव सिंधु पार हो जाए
तुम्हारे आशीर्वाद से हमारी सारी चिंताये मिट जाए.........
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर......
बेलपात्र औऱ धतूरा तुम्हे बहोत ही भाये
तुम्हारी सेवा मे हम केवडियों के सारे दुःख दर्द मिट जाए........
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर.......
इस सावन मे हम भक्तों के मुख से आपकी प्रार्थना हो जमकर.........
तुम्हारी दर्शन क़ी आसं मे कदम हमारे मुडे तुम्हारे हर स्थानों पर.........
हे नवामी शंकर हे भोले शंकर
कृपा करो हमपर.......
✍️अजय सरजोशी

शीश पे जिनके गंग विराजे अमित पाठक शाकद्वीपी जी

शिव काव्याभिषेकम्
-----------------------
(प्रथम दिवस शब्द *श्रीकण्ठ* आधारित)
🔱🔱🔱🔱🔱

शीश पे जिनके गंग विराजे,
गले सर्प की माला,
तन पर भस्म रमाए रहते,
अरु बाघाम्बर छाला।।

कानों में कुण्डल छलकाते,
मस्तक पर प्रभु चन्द्र सजाते,
पिए हालाहल प्याला,
अद्भुत रूप निराला ।।

डम डम डमरू नाद पुकारे,
शिव शिव शिव शिव नाम उच्चारे,
कष्ट हरे जो सारा,
उस शंभू का ही सहारा।।

नीलकंठ *श्रीकण्ठ* कहाते,
पशु पक्षी को अंक लगाते,
पार्वती को प्यारा,
नमन करे जग सारा।।

विपदा दूर करो प्रभु मन की,
पीड़ा हर लो सबके तन की,
देव बड़ा ये आला,
भोले फिरत रहे मतवाला।।

– अमित पाठक शाकद्वीपी

नील कंठ शिव : विजय डांगे जी

🪻नील कंठ शिव🪻
सत्यम,शिवम,सुंदरम वाले।
नीलकंठ भोले
मतवाले।।ध्रू।।
शिष् जटा गंगाधर सुंदर।
करत्रिशूल श्रीकंठ सुधाकर।
अंग मसान विभूति 
वाले।।१।।
 गर्दन सुंदर नील शिरोमणि। विश धरशोभा गले मुकुतामनि। मृगआसन कटी,घंटी 
वाले।।२।।
समुद्र मंथन गरल पान शिव। नीलकंठ श्रीकंठ भये शिव।
त्रिनेत्र धारी नंदी 
वाले।।३।। 
गौरी संगमें पूजा सावन।
महादेव विकराल संग गण।
पिशाच विजय भूत 
वाले।।४।।
नीलकंठ भोले*******
रचना_प,विजय डांगे,नागपुर
         महाराष्ट्र

श्रीकण्ठ महादेव : हेमलता साहूकार जी

श्रीकण्ठ महादेव
देवों के देव हैं महादेव
श्रीकण्ठ महादेव
सुखकर्ता ,दुखहर्ता
जग के पालनकर्ता,
श्रीकण्ठ महादेव।
समुद्र मंथन से निकला
विष और अमृत
अमृत सब ले लिए
हलाहल को क्या करें
समझ न आये,
सारे विष शिव ने पी लिये
और नीलकण्ठ कहलाये।
बिन माँगे जो सब देते हैं
ऐसे हैं हमारे श्रीकण्ठ महादेव,
सावन में कण-कण में विराजे
दूध,दही,घी,शहद,
बेलपत्र,जल अतिप्रिय लागे,
जटा में गंगा धारे,
गले में सर्प की माला
अवघड़दानी ,भभूति रमाये
पार्वती पति हैं जो
जन-जन के प्यारे
घट-घट के वासी
सबके रक्षक हैं
देवाधिदेव महादेव
श्रीकण्ठ महादेव
देवों के देव महादेव।

*हेमलता साहूकार*
*कुरुद (छ ग)*

श्रीकंठ नाम तुम्हारा : नीरजा वर्मा जी

प्रथम नाम श्रीकंठ/सुंदर गर्दन कंठ वाले
श्रीकंठ नाम तुम्हारा,
लोक में जब संकट आया, त्राहि मची देवों के बीच, 
भोले बाबा करुणा धारी, विषपान किया तुमने, 
संकट से बचाया।

गले में सजे नाग की माला,
नीलकंठ तुम्हे जग ने पुकारा
खाल पहनते बाघ की,
त्रिनेत्र नयन विशाल हृदय तुम्हारा। 

गंगा जटाओ में विराजे,
भस्म लगाते वैराग्य धारी, 
डम डम डम डम डम डमरू बाजे, 
 बन जाते नटराजधारी।

भोले बाबा दानी हो तुम, 
निर्मल करुणा हृदय धारी।
सावन का महीना आया 
रिमझिम पड़े फुहार, 

कृपा करो भक्तों पे अपने 
मन का विष भी हर लो,
दूर करो संताप,
तुम हो जग के भोले भंडारी।

© नीरजा वर्मा

नीलकंठ धारी : डॉ बलवंत सिंह जी

नीलकंठ धारी।

गले में सर्पों की माला।
बदन श्मशान विभूति वसन।
नीली नीली अंखियों में नीलमणि।
जटाओं में गंगा की बहती धारा।
पहाड़ों में कंदराओं में त्रिशूलधारी की लीला।
नवग्रहों का कहते उसको जन्मदाता।
त्रिगुणात्मक गुणों की रचना करने वाला।
घर घर में पूजे जाने वाले नाथ।
श्री कंठ त्रिपुरारी,नीलकंठ धारी।
जगत के आदि अंत के रचयिता और रखवाले।
ऐसे मेरे शिवा जगत में सबसे निराले।

© डॉ बलवंत सिंह

श्री कंठ वह, जो नील गले में : डॉ रूपाली गर्ग जी (नारी स्वर)

श्री कंठ वह, जो नील गले में, विष का प्याला पी गए,
संसार डोलता देख कर, खुद ही दुख के सीने लगे।

देव भी काँपे, दानव हारे, न कोई राह सुझी,
तब शिव शंभू आगे आए, सम जीवन की बुझी।

गले में अग्नि-सा कालकूट, पर मुख पर शांति अपार,
श्री कंठ के तेज से मिटा, सृष्टि का हर संकट-संहार।

त्रिशूलधारी, जटाधारी, गंगा जिनके माथ,
नभ के नील से कंठ सुशोभित, चंद्र करे दिन-रात।

जो अपने लिए कुछ न बोले, पर जग के हित जिए,
वो भोलेनाथ श्री कंठ हैं, जो दुख सबके पी गए।

हे नीलकंठ, हे त्रिपुरारी, तुम्हें नमन सौ बार,
तेरी भक्ति से कटे सभी, जीवन के संकट-वार

 डॉ रुपाली गर्ग 
मुंबई महाराष्ट्र

महादेव तब आगे आयै : मुन्ना राम मेघवाल जी

*महादेव तब आगे आयै।*
****---****---****---****
सागर मंथन का दिन आया,
मथने लगे देव और दानव सारे।
जब घट हलाहल का बाहर आया,
तब घबरा गये देव,दानव सारे।।

ना किसी को भी राह मिले,
भोले हलाहल का हम क्या करे।
वो महादेव तब आगे आये,
विष को अपने श्रीकंठ लगाये।।

गरल को तुमने गले लगाया,
मानवता का मान बढाया।
श्रीकण्ठ श्याम वर्ण के हो गये तेरे,
नीलकंठ सबने तोरा नाम कहाया।।

देव दानव तुझे दोनो पूजतै,
ओघड़बाबा तुम कहलातै।
भस्म रमाते तुम जिस्म पर,
भूत पिशाच के मन मे बसतै।।

डमरू की तुम धुन बजातै,
ना जीव जीव मे भेद करतै।
मन्नू शरणागत की रक्षा करते,
हमें मुंह मांगा तुम वर देतै।।

स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित है।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।

त्रिय ताप हरो, मम् कष्ट हरो : नेहा कुमारी जी

मेरी कलम से ✍️

त्रिय ताप हरो, मम् कष्ट हरो,
मेरी बाधाएं दूर करो,हे शंकर!
मेरे जीवन का तुम हो विहान,
तेरी स्तुति करती मैं भगवान 
ताप हरो हे शिव शंकर!


दूर करो अब ये अंधियारा,
क्यूं फैला है जीवन में कुहासा?
क्यूं बन गया जीवन ये तमाशा?
एक किरण रोशनी दे दो, मुझे 
तम को इस जीवन से हर लो।
करो प्रभु कोई समाधान 
ताप हरो हे शिव शंकर!

नाव खड़ी जीवन के तीरे,
बैठ गई मैं, मन में हिलोरें।
लहरें हैं कितनी ऊंची,
डर लागे कि कस्ती डूबी।
बनके खिवैया आओ स्वामी,
पार लगा दो मेरे महादेव।
ताप हरो कष्ट हरो
ताप हरो हे शिव शंकर!

मन नहीं लागे, डर है लागे,
आगे बढूं, फिर मैं हटूं ।
ऐसी दुविधा क्या मैं करूं।
मुझको भरोसा नहीं खुद पर,
टूट चुकी जीवन में अबतक 
कदमों में मेरे भर दो उत्साह 
यही करूं मैं तुमको आवाहृन
कष्ट हरो ताप हरो!
ताप हरो हे शिव शंकर!

  नेहा कुमारी ✍️

मंथन का विष पीकर भोले : आरती पाण्डेय जी

मंथन का विष पीकर भोले।
नीलकंठ कहलाए।
स्वयं शम्भू रहे पीड़ा में,
जग पीड़ा हरने आए।

त्याग समर्पण बलिदान आपका,
महादेव कहलाए।
पार्वती संग ब्याह रचकार।
प्रेम यहां दर्शाए।

गौरा के संग कैलाश पर,
प्रभू धूनी रमाए।
श्री राम का ध्यान लगाकर,
भक्ति भाव जगाए।

भोले बाबा अवघडदानी।
महिमा के गुण गाए।
आदि देव महादेव विभू का,
हम गुणगान सुनाए।

तेरी कृपा से ही भगवन्,
भव सिंधु पार हो जाए।
दया निधि धानेश्वर मेरे,
विपदा सारी मिटाएं।

बेल पत्र और भांग धतूरा,
जो भी उन्हें चढ़ाएं।
बिन मांगे वो सारी दौलत,
उनसे यहां है पाए।
         आरती पांडेय 
‌ ✍️ 🌹 🙏 

      ‌

शोभित कंठ नीलमणि : डॉ बीएल सैनी जी

शोभित कंठ नीलमणि
शोभित कंठ नीलमणि धारी,
त्रिपुण्ड लगाते भाल उजारी।
सर्पों की माला, रुद्र विराजे,
भूतों संग, सदा शिव साजे।

श्रीकण्ठ वह, हलाहल पिया,
त्राण हेतु अमृत विष सिया।
नीलकंठ वह करुणा सागर,
सृष्टि करे जो सहज उबारक।

डमरु की धुन, गगन गूंजता,
नटराज रूप, समय को नाचता।
शिव कृपा हो जिस पर भारी,
भवसागर वह पार उतारी।
🌿 हर हर महादेव 🌿

डॉ बीएल सैनी 
श्रीमाधोपुर सीकर राजस्थान

मेरी कलम से : लोकेश कौशिक जी

नीलकंठ महादेव 
श्रीकंठ पर भुजंग धर 
भस्म सारे अंगों पर मले 
जटा से पाविनी गंगा निकले 
कैलाश पर ध्यान धरे 
निकट नंदी- भृंगी नृत्य करें 
मस्तक पर चंद्र हंसें 
गौरा की थाली में अक्षत, दीप सजे 
सभी देव मिलकर श्रीकंठ का जय-जयकार करें।

© लोकेश कौशिक जी 

आशुतोष शंकरा : नीलम सगोरिया जी

आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा शिव समाए सृष्टि में सूक्ष्म रूप कंकरा तुमआकाश , तुम पाताल हो विशाल शंकरा आशुतोष शंकरा नमामि देव शंकरा बारह ज्य...