श्रीकंठ नाम तुम्हारा,
लोक में जब संकट आया, त्राहि मची देवों के बीच,
भोले बाबा करुणा धारी, विषपान किया तुमने,
संकट से बचाया।
गले में सजे नाग की माला,
नीलकंठ तुम्हे जग ने पुकारा
खाल पहनते बाघ की,
त्रिनेत्र नयन विशाल हृदय तुम्हारा।
गंगा जटाओ में विराजे,
भस्म लगाते वैराग्य धारी,
डम डम डम डम डम डमरू बाजे,
बन जाते नटराजधारी।
भोले बाबा दानी हो तुम,
निर्मल करुणा हृदय धारी।
सावन का महीना आया
रिमझिम पड़े फुहार,
कृपा करो भक्तों पे अपने
मन का विष भी हर लो,
दूर करो संताप,
तुम हो जग के भोले भंडारी।
© नीरजा वर्मा
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