Friday, July 11, 2025

श्रीकण्ठ महादेव : रमापति मौर्य जी

'श्रीकण्ठ महादेव '

 श्रीकण्ठ महादेव तुम्हारी,
  जग में महिमा न्यारी।
 सुन्दर लम्बी जटा तुम्हारी, लगती प्यारी- प्यारी।।१।।

चिर समाधि में लीन भोले,
 भोली -भाली मुस्कान। कण-कण में बसते हे भोले ,
  गजब तेरी मुस्कान ।।२।।
   
 शीष चन्द्रमा जटा में गंगा,
    गले में विषधर नाग।
बिच्छू -बाघाम्बर से शोभित ,
 शोभित होते विष नाग।।३।।

   कैलाशपति हे शिव शंकर!
   हे आशुतोष !भोले दानी।
  भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते,
   करुणानिधि भोले दानी।।४।।
    
   मेरा भी कष्ट हरो भोले, 
   संकटमोचक- विषपाई ।
   हंसकर हरते कष्ट भक्त के,
    भक्तों के सुखदाई ।।५।।

   देते अमृत दुनियां को,  
   खुद हलाहल पी जाते।
  तभी तो बाबा नीलकंठ ,
    भोले कहलाते।।६।।

तेरी तुलना नहीं है जग में,
    कोई करने वाला। 
तू तो है जग भोला दानी,
   संकट हरने वाला।।७।।

   कालों के हो महाकाल,
जग तुझको कालेश्वर कहता।
  सृष्टि के हो संहारक ,
उत्थान -पतन जग कहता।।८।।

विरक्त भाव -समाधि लीन,
तन भस्म सुसज्जित होता। 
तीन लोक में काशी न्यारी,
शिव जय -जय कारा होता।।९।।

महिमा गजब निराली भोले,
    भांग -धतूरा खाते।
गले में नाग कान में बिच्छू,
 भोले शोभित होते।।१०।।
 
धन्य- धन्य हो भोले बाबा,
    धन्य तुम्हारी कृपा।
सारा जग है तेरी शरण में, 
    रहती तेरी कृपा।।११।।

  © रमापति मौर्य,
 अंबेडकर नगर ,
   उत्तर प्रदेश

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