संसार डोलता देख कर, खुद ही दुख के सीने लगे।
देव भी काँपे, दानव हारे, न कोई राह सुझी,
तब शिव शंभू आगे आए, सम जीवन की बुझी।
गले में अग्नि-सा कालकूट, पर मुख पर शांति अपार,
श्री कंठ के तेज से मिटा, सृष्टि का हर संकट-संहार।
त्रिशूलधारी, जटाधारी, गंगा जिनके माथ,
नभ के नील से कंठ सुशोभित, चंद्र करे दिन-रात।
जो अपने लिए कुछ न बोले, पर जग के हित जिए,
वो भोलेनाथ श्री कंठ हैं, जो दुख सबके पी गए।
हे नीलकंठ, हे त्रिपुरारी, तुम्हें नमन सौ बार,
तेरी भक्ति से कटे सभी, जीवन के संकट-वार
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र
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