*महादेव तब आगे आयै।*
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सागर मंथन का दिन आया,
मथने लगे देव और दानव सारे।
जब घट हलाहल का बाहर आया,
तब घबरा गये देव,दानव सारे।।
ना किसी को भी राह मिले,
भोले हलाहल का हम क्या करे।
वो महादेव तब आगे आये,
विष को अपने श्रीकंठ लगाये।।
गरल को तुमने गले लगाया,
मानवता का मान बढाया।
श्रीकण्ठ श्याम वर्ण के हो गये तेरे,
नीलकंठ सबने तोरा नाम कहाया।।
देव दानव तुझे दोनो पूजतै,
ओघड़बाबा तुम कहलातै।
भस्म रमाते तुम जिस्म पर,
भूत पिशाच के मन मे बसतै।।
डमरू की तुम धुन बजातै,
ना जीव जीव मे भेद करतै।
मन्नू शरणागत की रक्षा करते,
हमें मुंह मांगा तुम वर देतै।।
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित है।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।
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